कुछ कहानियां पढ़ने के लिए नहीं होतीं, उन्हें महसूस करना पड़ता है। यह भी ऐसी ही एक कहानी है। यह किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि मेरी माँ की जिंदगी की सच्ची कहानी है।
हमारा परिवार बहुत बड़ा नहीं है। मेरी माँ, मेरे पापा और हम तीन भाई—बस यही हमारी दुनिया है। माँ ने पूरी जिंदगी हम बच्चों के लिए जी। लेकिन आज वही माँ एक ऐसी बीमारी से लड़ रही हैं, जिसने हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी है।
यह कहानी उस दिन से शुरू नहीं हुई, जिस दिन हमें कैंसर का पता चला। इसकी शुरुआत उससे कई साल पहले हो चुकी थी।
करीब 9–10 साल से थी पेट की परेशानी
मेरी माँ को करीब 9–10 साल से पेट की समस्या थी। उन्हें अक्सर गैस बनती थी और कई बार पेट साफ नहीं होता था। इसके लिए वह गैस की गोलियां और दूसरी दवाइयां लेती रहती थीं।
हमारे लिए यह एक सामान्य परेशानी थी। हमें लगता था कि पेट की समस्या है, दवा लेने से ठीक हो जाएगी। सालों तक यही चलता रहा।
कभी परेशानी ज्यादा होती, कभी कम। माँ दवा लेतीं और जिंदगी आगे बढ़ती रहती।
हमें उस समय बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि आने वाले समय में हमारी जिंदगी इतनी बदल जाएगी।
फिर शुरू हुआ कमर और पीठ का दर्द
कुछ साल बाद माँ की कमर के पीछे, पीठ और गर्दन के पीछे दर्द शुरू हुआ।
शुरुआत में हम मेडिकल स्टोर से दवा लेकर आते थे। माँ दवा खातीं तो कुछ समय के लिए आराम मिल जाता। लेकिन कुछ दिन बाद दर्द फिर वापस आ जाता।
धीरे-धीरे दर्द बढ़ने लगा।
जब दर्द ज्यादा बढ़ गया तो CT और MRI जैसी जांचें कराई गईं। जांच में पता चला कि उनकी कमर की एक नस दब रही थी, जिसकी वजह से दर्द हो रहा था।
इसके बाद इलाज शुरू हुआ।
करीब दो साल से ज्यादा समय तक दवाइयां चलती रहीं। कभी गोरखपुर से इलाज कराया, कभी लखनऊ से। हम जहां भी उम्मीद दिखाई देती, वहां माँ को लेकर चले जाते।
दवा से कुछ आराम मिलता रहा और जिंदगी किसी तरह चलती रही।
लेकिन शायद असली परीक्षा अभी बाकी थी।
एक खांसी जिसने सब कुछ बदल दिया
कुछ समय बाद माँ को खांसी शुरू हुई।
पहले खांसी हुई और फिर ठीक हो गई। कुछ समय बाद दोबारा हुई और फिर ठीक हो गई।
लेकिन एक समय ऐसा आया जब खांसी लगातार रहने लगी।
सिरप और दवाइयों से भी आराम नहीं मिल रहा था।
हम माँ को गोरखपुर AIIMS लेकर गए। वहां Pulmonary डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने दवाइयां दीं और कुछ जांचें लिखीं।
हमने जांचें कराईं और दवाइयां लेकर घर वापस आ गए।
लेकिन करीब पांच दिन की दवा लेने के बाद भी खांसी कम नहीं हुई।
बल्कि खांसी और बढ़ती गई।
खांसते-खांसते सीने में दर्द होने लगा
माँ की खांसी इतनी बढ़ गई थी कि खांसते-खांसते उनके सीने में भी दर्द होने लगा।
हम उन्हें दोबारा AIIMS लेकर गए।
इस बार डॉक्टर ने फेफड़ों की अंदर से जांच कराने को कहा। अगले दिन जांच की तारीख मिली।
जांच के दौरान फेफड़े से एक छोटा-सा टुकड़ा लिया गया और उसे जांच के लिए लैब भेज दिया गया।
हमें बताया गया कि रिपोर्ट करीब सात दिन बाद आएगी।
हम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे।
लेकिन इसी बीच माँ की गर्दन में एक गांठ जैसी दिखाई देने लगी।
और यहीं से हमारी जिंदगी ने अचानक एक बहुत बड़ा मोड़ लिया।
वह दिन जब पहली बार पता चला—कैंसर है
उसी दिन मैं माँ को गोरखपुर में दूसरे डॉक्टर के पास लेकर गया।
डॉक्टर ने FNAC जांच लिखी।
हमने तुरंत जांच कराई।
जब रिपोर्ट आई तो उसमें कैंसर की बात सामने आई।
पहली बार हमें पता चला कि मेरी माँ को कैंसर है।
उस पल को शब्दों में बयान करना आसान नहीं है।
कैंसर शब्द हम सबने पहले भी सुना था। लेकिन जब वही शब्द अपनी माँ के लिए सुनाई देता है, तो उसका मतलब पूरी तरह बदल जाता है।
पापा थे।
हम तीनों भाई थे।
और सामने हमारी माँ थीं।
माँ की हालत भी खराब हो रही थी। खांसी लगातार बढ़ रही थी और शरीर कमजोर होता जा रहा था।
हमारे पास समय कम था।
उसी दिन शुरू हुआ रोहतक का सफर
हमने देर नहीं की।
उसी दिन माँ को लेकर गोरखपुर से रोहतक PGIMS के लिए निकल गए।
रास्ता लंबा था।
लेकिन उस सफर में हमें रास्ते की लंबाई महसूस नहीं हो रही थी। हमारे दिमाग में बस एक ही सवाल था—
माँ को कैसे बचाया जाए?
रोहतक पहुंचने के बाद डॉक्टर पवन कुमार से मिले। वहां गर्दन की गांठ की FNAC जांच दोबारा हुई।
जांच में कैंसर की पुष्टि हो गई।
माँ को उसी दिन भर्ती कर लिया गया।
और फिर शुरू हुआ कीमोथेरेपी का दौर।
छह कीमोथेरेपी और माँ की तकलीफ
कीमोथेरेपी शुरू होने के बाद माँ का शरीर बहुत कमजोर होने लगा।
कीमो के अगले दिन उन्हें बहुत ज्यादा उल्टियां हुईं। शरीर में कमजोरी बढ़ती गई।
लेकिन इसी इलाज के दौरान बीमारी में कमी भी दिखाई देने लगी।
हर 21 दिन में कीमो लगती रही।
एक कीमो...
फिर दूसरी...
फिर तीसरी...
और देखते-देखते कुल छह कीमोथेरेपी पूरी हुईं।
हर बार हमारे मन में एक ही उम्मीद रहती थी—
शायद अब माँ ठीक हो जाएंगी।
कीमो के बाद गर्दन की गांठ काफी कम हो गई थी।
हमें लगा कि शायद अब बीमारी पीछे हट रही है।
हम माँ को रोहतक से वापस घर ले आए।
उस समय हमारे घर में फिर से उम्मीद आई थी।
लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी।
डेढ़ महीने बाद फिर शुरू हुई खांसी
करीब डेढ़ महीने बाद माँ को फिर खांसी शुरू हो गई।
हम डर गए।
फिर CT Scan कराया गया।
रिपोर्ट में पता चला कि बीमारी फिर बढ़ रही थी।
एक बार फिर इलाज का अगला दौर शुरू हुआ।
इस बार इंजेक्शन लगाए जाने लगे।
पहले सात दिन के अंतर पर और फिर 14 दिन के अंतर पर।
सात दिन...
फिर 14 दिन...
फिर सात दिन...
फिर 14 दिन...
ऐसे ही लगभग 15 इंजेक्शन लगे।
हर बार हमारे मन में उम्मीद रहती थी कि शायद अब बीमारी रुक जाएगी।
लेकिन इतने इलाज के बाद माँ का शरीर बहुत कमजोर हो चुका था।
जब इंजेक्शन बंद हो गए
एक समय डॉक्टर ने कहा कि अब इंजेक्शन नहीं लगाया जाएगा।
इसके बाद डॉक्टर ने Axitinib 5 mg की दवा लिखी।
आज इस दवा को लेते हुए करीब चार महीने हो चुके हैं।
लेकिन बीमारी और लंबे इलाज ने माँ के शरीर को बहुत कमजोर कर दिया है।
आज स्थिति यह है कि माँ अपने पैरों पर खुद खड़ी नहीं हो पातीं।
उन्हें उठाना पड़ता है।
चलने के लिए सहारा देना पड़ता है।
और यही वह चीज है जो हमें अंदर से तोड़ देती है।
जिस माँ ने हमें चलना सिखाया...
कभी माँ ने हमारा हाथ पकड़कर हमें चलना सिखाया था।
जब हम छोटे थे और गिरते थे, तो माँ हमें उठाती थीं।
हमें डर लगता था तो माँ हमारे पास होती थीं।
हमें भूख लगती थी तो माँ खाना देती थीं।
हम बीमार होते थे तो माँ रातभर जागती थीं।
आज समय बदल गया है।
आज वही माँ कमजोर होकर बिस्तर पर हैं।
आज उन्हें उठाने के लिए हमारा हाथ चाहिए।
चलने के लिए हमारा सहारा चाहिए।
कभी-कभी मन में सिर्फ एक सवाल आता है—
जिस माँ ने जिंदगी भर हमारा दर्द अपने ऊपर लिया, आज उनका दर्द हम अपने ऊपर क्यों नहीं ले सकते?
काश ऐसा हो पाता।
काश माँ की बीमारी का थोड़ा-सा दर्द भी हम अपने हिस्से में ले पाते।
लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते।
हम सिर्फ उनके साथ रह सकते हैं।
उनका हाथ पकड़ सकते हैं।
उनके पास बैठ सकते हैं।
और उन्हें यह बता सकते हैं कि—
“माँ, आप अकेली नहीं हैं।”
पापा और हम तीन भाई
इस पूरी लड़ाई में पापा भी माँ के साथ हैं।
हम तीनों भाई भी अपनी मां के पास हैं।
हमारे पास कोई बड़ी ताकत नहीं है।
हम बीमारी को अपने हिसाब से रोक नहीं सकते।
हम भविष्य नहीं बदल सकते।
लेकिन एक चीज हम कर सकते हैं—
माँ को अकेला नहीं छोड़ सकते।
क्योंकि माँ हमारे लिए सिर्फ एक इंसान नहीं हैं।
माँ हमारे घर की वह वजह हैं, जिसके कारण घर घर लगता है।
आज भी उम्मीद बाकी है
आज हम नहीं जानते कि आने वाला कल कैसा होगा।
हमें नहीं पता इलाज आगे किस तरह चलेगा।
हमें नहीं पता बीमारी क्या मोड़ लेगी।
लेकिन हम इतना जानते हैं कि जब तक माँ हमारे साथ हैं, तब तक हम उनके साथ रहेंगे।
बीमारी ने हमारी जिंदगी बदल दी है।
लेकिन माँ के लिए हमारा प्यार नहीं बदल सकता।
हम आज भी उम्मीद करते हैं कि कोई अच्छा दिन आएगा।
माँ फिर अपने पैरों पर खड़ी होंगी।
शायद पहले जैसी ताकत वापस आए...
शायद वह फिर हमारे लिए मुस्कुराकर खाना बनाएं...
शायद हम फिर उसी तरह उनके पास बैठकर बातें करें...
हमें नहीं पता यह सब कब होगा।
लेकिन उम्मीद करना हमने अभी छोड़ा नहीं है।
माँ, आपकी लड़ाई अभी बाकी है
माँ ने पूरी जिंदगी हमारे लिए जी है।
अब हमारी बारी है।
माँ अगर कमजोर हैं, तो हम उनका सहारा बनेंगे।
अगर उन्हें चलने में परेशानी है, तो हम उनका हाथ पकड़ेंगे।
अगर उन्हें डर लगेगा, तो हम उनके पास बैठेंगे।
और अगर कभी उन्हें लगेगा कि वह अकेली हैं... तो हम उन्हें याद दिलाएंगे—
माँ, आपके तीन बेटे हैं। आपके पास पापा हैं और हम सब आपके साथ हैं।
हमें नहीं पता जिंदगी हमें आगे कहां लेकर जाएगी।
लेकिन एक बात तय है—
माँ की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
और जब तक माँ लड़ रही हैं...
हम भी उनके साथ लड़ते रहेंगे।
अगर आपकी माँ आपके साथ हैं, तो आज उनके पास बैठिए।
उनसे बात कीजिए।
उनका हाथ पकड़िए।
क्योंकि जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनकी कीमत शब्दों में नहीं बताई जा सकती।
माँ उन्हीं रिश्तों में से एक हैं।
मेरी माँ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
माँ की लड़ाई अभी बाकी है...
0 टिप्पणियाँ
Your Answaer :