केंद्र सरकार ने साल 2011 में एक सर्वे कराया था, जिसमें पता चला कि देश में लैंड होल्डिंग आकार दो एकड़ से भी कम का है.
ग्रामीण इलाकों में एक चौथाई फ़ीसदी परिवारों के पास महज 0.4 एकड़ जमीन है और एक चौथाई लोग भूमिहीन हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने, इनपुट्स लगाने, ज़मीन सुधारने, जल संरक्षण और पौधों को बचाव के वैज्ञानिक तरीके अपनाने में यह छोटी जोत बड़ी समस्या है. खेती का मशीनीकरण इन हालात में मुश्किल है.
ज़्यादातर राज्यों में भूमि सुधार की धीमी रफ़्तार इस समस्या को और बढ़ा देती है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटी जोत वाली ज़मीनों को एक जगह कर उनका आकार बड़ा कर देने से पैदावार बढ़ाने में मदद मिलेगी.
कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग में छोटी जोत वाले किसान ज्यादा कमज़ोर स्थिति में होंगे. अगर किसी विवाद की स्थिति में उसे कॉर्पोरेट से लोहा लेना हो तो वो उसके बूते की बात नहीं होगी.
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