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किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए किसी नज़दीकी अस्पताल में ख़बर करनी है और किस तरह से उसके बारे में Co-WIN ऐप में पूरी विस्तृत जानकारी को भरना है, ये भी बताया गया है.
क्या हर टीकाकरण अभियान में एक जैसा ही एडवर्स इफ़ेक्ट होता है?
भारत में हुए अब तक के टीककारण अभियान के बाद कम ही लोगों को अस्पताल में दाख़िले की ज़रूरत पड़ी है.
उन्होंने बताया कि ज़्यादातर ये दिक़्क़तें मामूली होती हैं, जिन्हें माइनर एडवर्स इफ़ेक्ट कहा जाता है. ऐसे मामलों में किसी तरह का दर्द, इंजेक्शन लगने की जगह पर सूजन, हल्का बुख़ार, बदन में दर्द, घबराहट, एलर्जी और रैशेज़ जैसी दिक़्क़त देखने को मिलती है."
इसलिए ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर एडवर्स इफ़ेक्ट फ़ॉलोइंग इम्यूनाइज़ेशन (AEFI) क्या है और यह कितनी सामान्य या असामान्य बात है.
इसके अलावा कुछ लोग एडवर्स साइड इफ़ेक्ट्स की खबरें सुन कर भी टीका लगवाने से थोड़ा बच रहे थे.
डॉ. रमन गंगाखेड़कर का मानना है कि दूसरा डोज़ ना लेने वाले सिर्फ़ हिचक की वजह से ऐसा कर रहे हैं, ये पूरी तरह सच नहीं हैं.
भारत में कोरोना का टीकाकरण अभियान 16 जनवरी से शुरू हुआ है. दूसरा डोज़ 13 फरवरी से लगना शुरू हो गया है.
केंद्र सरकार ने साल 2011 में एक सर्वे कराया था, जिसमें पता चला कि देश में लैंड होल्डिंग आकार दो एकड़ से भी कम का है.
डॉक्टर लाल का कहना है कि सरकार को एक समग्र सोच बना कर सुधार करना होगा. उनका मानना कि किसानों के कल्याण के लिए कृषि सुधार जरूरी हैं और इन्हें टाला नहीं जा सकता
मानसून चक्र का विश्लेषण और भूजल स्तर का पता लगा लेने से किसान खेती के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकेंगे.
 इस सिंचाई से पौधों को किस वक्त क्या चाहिए उस हिसाब से यह मिल जाता है. लिहाजा, उनकी ज़्यादा से ज़्यादा बढ़त होती है.
डॉक्टर लाल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भारतीय किसान अब धान, गेहूँ, गन्ना, कपास और सोयाबीन जैसी परंपरागत फसलों के बजाय कुछ और दूसरी फसलें उगाएं.
डॉक्टर लाल कहते हैं, "मिट्टी में जैव तत्वों की लगभग पूरी तरह अनुपस्थिति से न सिर्फ़ फसलों की पैदावार कम हुई बल्कि इनमें 'माइक्रो न्यूट्रिएंट्स' भी घटे हैं.''
डॉक्टर लाल का कहना है कि भारत की मिट्टी को इसके स्वाभाविक उपजाऊ स्तर तक पहुँचने में एक या दो पीढ़ियाँ लग जाएंगीं. भारत में प्रति हेक्टेयर कृषि पैदावार 2.1 टन है. अगर हम अपनी मिट्टी की सेहत बरकरार रख पाएं तो यह दोगुनी हो सकती है.  वो कहते हैं, "मैंने 1980 के दशक में अपनी मिट्टी को उपजाऊ बनाने की कोशिश में लगे कई चीनी वैज्ञानिकों को ट्रेनिंग दी थी. अब उन्होंने अपने यहाँ की मिट्टी को सेहतमंद बना कर यह लक्ष्य हासिल कर लिया है."  किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह डॉक्टर लाल से सहमत लगते हैं लेकिन उनका कहना है कि पंजाब और हरियाणा के खेतों में कुछ न्यूट्रिएंट्स वापस चले जाते हैं.  वो कहते हैं "हम धान और गेहूँ के बीच कई किस्मों की दालें उगाते हैं. ये मिट्टी को काफ़ी पोषक तत्व देती हैं. हम इसके खर-पतवार और बची फसलों को मिट्टी में मिला देते हैं. इससे यूरिया कम लगता है."  लेकिन पुष्पेंद्र सिंह यह भी मानते है कि इतना काफ़ी नहीं है.  वो कहते हैं, ''डॉक्टर लाल की थ्योरी बिल्कुल सही है. लेकिन मिट्टी में दोबारा उसका पुराना उपजाऊपन लौटा लाना काफ़ी खर्चीला काम है.''  पुष्पेंद्र सिंह का मानना है कि किसानों से इसका ख़र्चा उठाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इसका खर्चा सरकार को उठाना चाहिए.  वो कहते हैं, "पहले हम एक फसल लेने के बाद कुछ ज़मीन परती छोड़ देते थे. लेकिन आज दो या इससे ज़्यादा फसल लेनी पड़ती है क्योंकि खेती की लागत काफ़ी बढ़ गई है. अगर सरकार दूसरी फ़सल की कीमत हमें दे तो हम सिर्फ एक फ़सल की खेती करें. लेकिन क्या सरकार के पास इसके लिए बजट है?'
मानसून पर टिकी सिंचाई
मेरिका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में काम करने वाले भारतीय मूल के मशहूर मृदा वैज्ञानिक डॉक्टर रतन लाल का कहना है
चीन भारत से कम ज़मीन पर खेती करता है लेकिन इससे अधिक फसल उपजाता है
भारत में जो खेती होती है उसमें हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है. खेती के लिए मानसून और सिंचाई का पानी दोनों चाहिए.
साल 2016 में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट ने एक सरकारी सर्वे में पाया था कि तीन सालों में किसानों का कर्ज़ करीब दोगुना बढ़ गया था.
देश के 6 राज्य इससे पहले से ही कैश ट्रांसफर स्कीम चला रहे थे.
भारत में महंगाई दर पिछले कुछ सालों में बढ़ी है, वर्ल्ड बैंक के डेटा के मुताबिक उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 2017 में 2.5% से थोड़ी कम थी जो कि बढ़कर 2019 में लगभग 7.7% हो गई
आंदोलन एक सामूहिक संघर्ष है।
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26 जनवरी 1950
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